गुरुवार, 4 अगस्त 2016

अक्ल के पीछे लट्ठ -

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यह दुनिया विरोधों का तालमेल है,जिसमें संतुलन बनाये रखना बहुत ज़रूरी है  - जहाँ यह  बिगड़ा वहाँ गड़बड़ शुरू. एक निश्चित मात्रा में जो वस्तु लाभदायक है ,अनुपात बिगड़ते ही वह अनर्थ करने पर उतारू हो जाती है .और यह अक्ल नाम की बला जो इन्सान के साथ जुड़ी है बड़ी दुनियाबी चीज़ है.बाबा आदम के उन जन्नतवाले दिनों में इसका कहीं नामोनिशान नहीं था. मुसम्मात हव्वा की प्रेरणा से अक्ल का संचार हुआ परिणामस्वरूप हाथ आई  ख़ुदा से रुस्वाई  . अब भी उस परंपरा के लोग  बरकरार हैं ,जो  अक्ल से दुश्मनी  ठाने उस के पीछे लट्ठ लिये घूम रहे हैं . जिसने ज़रा सा भी उपयोग किया उसके लिये जहन्नुम रिज़र्व है .
अति सर्वत्र वर्जयेत् -
अक्ल आने का कोई निश्चित समय  नहीं होता किशोरावस्था से बुढ़ापे तक कभी भी  आ सकती है .और तब इंसानों के एक नई दाढ़ निकलते ही  पहले से  जमे हुये   दाँतों को अपदस्थ करने पर तुल जाती है.
 मुझे तो अक्ल की दाढ़ ने बड़ा परेशान किया .जब अच्छी तरह सिर उठा चुकी तब पता लगा . समझ में नहीं आता जब अक्ल आने की उम्र होती है तब यह  क्यों नहीं निकलती .  पढ़ाई और एक्ज़ाम का समय था तब  ग़ायब थी.सब ठीक-ठाक चलता रहा.अचानक निकल कर तमाशे दिखाने लगी  .  हर जगह अपनी टाँग अड़ाना शुरू कर देती है .खाना-पीना , चैन से जीना मुश्किल ! इसीलिये दाँतों के डॉ. इसे निकलवा देने की सलाह देते होंगे. .  
केवल अक्लमंद हों यह किसी के बस में नहीं - बेवकूफ़ियाँ साथ लगी-लिपटी  रहती हैं . सामने आने से कितना भी रोको ,जरा ढील पाते ही पाते ही प्रकट हो जाती हैं .
 दिमाग़ की कमी नहीं इस दुनिया में  ,पर अक्सर लोग ढीला छोड़ देते हैं .अपने बिहार की खासूसियतें तो जग-ज़ाहिर हैं.  एक  मुख्यमंत्री जी की  ज़ुबान ज़रा फिसल गई ,फिर क्या था ,मीडियावाले  तो इसी  ताक में रहते हैं ,ले उड़े ,  तमाशा बनने लगा . ये महोदय भड़क गए ,बोले हमें  गलत ढंग तक पेश किया गया . खिसियाहट में   पत्रकारों को उचक्का कह डाला ..यों उनका कथन ग़लत नहीं था -ये लोग भी तो कच्ची-पक्की हर बात उचक लेते हैं. मंत्री  ताव में थे चमड़े की ज़ुबान कबूलती चली गई - हम तो लात खाने के लिए ही बैठे हैं, कोई इधर से मारता है तो कोई उधर से..
सच में फ़ालतूवाली अक्ल है ही सारी  खुराफ़ातों की जड़ .जब अचानक बाढ़ आती है तो दिमाग़ का बैलेंस बिगड़ने लगता है.
 जानवरों में नहीं होती . कैसी शान्ति से रहते हैं .और ये फ़ालतू अक्लवाले ! न अपने को चैन , न दूसरों को चैन से जीने दे.  कभी इधर की कमी देखती है कभी उधर की चूक .अरे, अपने को क्या करना ? दुनिया जैसी है वैसी है ,कोई हमारे रोने-झींकने से बदल थोड़े ही न जायगी .कबीरदास जी सही कह गये  हैं -
सुखिया सब संसार है खाये अरु सोवे ,
दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवै.
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9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी और अक्ल के दरवाज़े खोल देने वाली बात कही है मम्मी! एक लंबे समय के बाद आपकी भी वापसी धमाकेदार रही. कम से कम मुझ जैसे अक्ल "मंद" के बंद अक्ल का ताला आपने खोल ही दिया.
    अक्ल की दाढ़ ने मुझे भी बहुत परेशान किया... हर छः महीने में निकलती और रुलाती फिर छिप जाती! और एक रोज महसूस हुआ कि मुझे अक्ल प्राप्त हो गयी.

    रही बात इन नेताओं की, तो इनकी अक्ल न तो दिमाग में होती है, न घुटनों में... इनकी अक्ल इनकी जीभ में होती है. और ये जीभ फिसलती तो कतई नहीं. ये जानबूझकर कहते हैं कोई बात... अगर किसी ने कोई आपत्ति नहीं की तो चल गयी, आपत्ति हुई तो माफी की अक्ल तो राजनीति ने बख्शी ही है. मदारी मीडिया को क्या चाहिए, ये नेताओं के आगे जीभ निकाले हाँफते रहते हैं और इंतज़ार करते हैं कि कब वो अपनी जीभ से कुछ मांसाहारी वक्तव्य उगलें और वो बोटियाँ काटें!

    मम्मी! बस यह सिलसिला चलता रहना चाहिए!

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    1. सलिल,"अक्लमंद" तो हो तुम ,दरवाज़े खुले थे ही,बस थोड़े-से खटका दिये मैंने .

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " हिन्दी Vs English - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. पता नहीं हमें कब आयेगी ? सुन्दर प्रस्तुति ।

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    1. अभी तक अक्ल की दाढ़ क्या एक बार भी निकलनी नहीं शुरू हुई ?.धैर्य रखिये ,ज़रूर कोशिश करेगी .

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-08-2016) को "धरा ने अपना रूप सँवारा" (चर्चा अंक-2427) पर भी होगी।
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    हरियाली तीज और नाग पञ्चमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. मेरा भी यही मानना है कि दुनिया में सबसे सुखी मूढ़ लोग होते हैं क्यों कि उन्हें किसी भी बात की अच्छाई या बुराई समझने की क्षमता नहीं होती है, अतः उन्हें किसी भी बात से कोई कष्ट नहीं होता है। अब क्या करें इस पढ़ाई-लिखाई ने सारा सुख चैन छीन लिया है। :)

    - अतुल श्रीवास्तव

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  6. फ़ालतू की अक्ल ही सब दुखों की जड़ है :):)

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