गुरुवार, 25 जुलाई 2013

हमें अपने भारतीय होने पर गर्व है !

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हमें अपने भारतीय होने पर गर्व है !

लेकिन काहे पर ? 
सब को पता तो चलें हमारी ख़ूबियाँ जिन्हें हम सिर उठा कर गिना दें  , अपने  भारतीयता के एहसास को और हवा दें !
 कहीं पसोपेश में न पड़ना पड़े इसलिये लगे हाथ हिसाब करते चलें  सारे  प्लस और माइनस प्वाइंट्स का ! 

शर्त बस इतनी कि वर्तमान की बात करें .हम ऐसे थे ,हम वैसे थे यह  हाँकने से क्या लाभ ?जब थे  तब थे  ,देखना तो यह है कि अब क्या हैं और किस ओर जा रहे हैं ! प्राचीन संस्कृति की बात उन्हें नहीं शोभती , जिन्हें हिन्दी महीनों के  नाम नहीं पता , गिनती करते समय हिन्दी के अड़तालीस-अट्ठावन ,उनसठ.उन्हत्तर आदि सुनते ही छक्के छूटने लगें . और भी कहाँ तक बखाने, हिन्दी की वर्णमाला का सही क्रम भी पता न हो जिन्हें !
ये जोड़-घटा वाले हिसाब पहले आपस में कर लें ,संभव है कुछ सफलता हाथ लगे और हम सामूहिक रूप से  अपने पर गर्व कर सकें ! 
यहाँ अमेरिका में मैंने देखा है कि पाकिस्तानी रेस्त्राओँ  में कभी अकेला पाकिस्तान नाम नहीं होता ,इंडिया का नाम जोड़े बिना उन्हें लगता है, सरे बाज़ार लँगड़ाने लग जाएँगे .और  यह भी , कि लोगों को अपनी सही  पहचान बताने में संकोच होता है .परिचय  में  अपनी असलियत छिपा कर  खुद को हिन्दुस्तान से आया  बताते हैं  , अगर बाद में  पता लग भी जाए तो  सफ़ाई यह , कि बाबा तो हिन्दोस्तान में ही रहे थे (  'भारत' से उन्हें परहेज़ है ,हिन्दोस्तान या इंडिया का प्रयोग करते हैं , हमारी सरकार ने इसीलिेए ये नाम रख छोड़े हैं.) शताब्दियों पहले  के अपने पुरखों को पहचाने भी  या ख़ुद  को कहीं और की उपज बता दें तो कोई क्या कर लेगा उनका  . यह उनकी  समस्या है वे जाने ,पर चेत हमें भी जाना चाहिये ! 
हाँ , बात है अपनी ख़ूबियाँ गिनाने की , तो समझ में नहीं आ रहा  कि कहाँ से चालू करें  -  शुरूआत कराने की कृपा करे कोई, तो क्रम आगे बढ़ता चले !
 सहायता की अपेक्षा  सभी से  !
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रविवार, 21 जुलाई 2013

पंचायत का निर्णय.

( इस लघुकथा को आपसे बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ .हमारे जिन मित्र ने यह  भेजी थी उन्हें धन्यवाद तथा अज्ञात लेखक के प्रति हार्दिक आभार सहित-)
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एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये ! 
हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं ! यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा ! भटकते २ शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज कि रात बिता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !
रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे उस पर एक उल्लू बैठा था  वह जोर २ से चिल्लाने लगा।
हंसिनी ने हंस से कहा, अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते। ये उल्लू चिल्ला रहा है। हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही। पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों कि बात सुन रहा था। सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो। हंस ने कहा, कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद !
यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो। हंस चौंका, उसने कहा, आपकी पत्नी? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है !
उल्लू ने कहा, खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है। दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग इक्कठा हो गये। कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। पंच लोग भी आ गये ! बोले, भाई किस बात का विवाद है ? लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है !
लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पञ्च लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना है ! फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों कि जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है !
यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली ! रोते- चीखते जब वहआगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको ! हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?
उल्लू ने कहा, नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी ! लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है ! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है । यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पञ्च रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं !
शायद ६५ साल कि आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने हमेशा अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है। इस देश की बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं।
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बुधवार, 17 जुलाई 2013

राम-रजाई.

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अम्माँ सुबह पूजा के समय एक दोहा बोलती हैं -
'राम रजाई रावरी ,है सब ही का हेत ..'
उनकी पूजा लम्बी चलती है , बोलते-बोलते ध्यान और चीज़ों पर भी तो देना पड़ता है .जितनी स्तुतियाँ आदि याद हैं इधऱ का उधर जोड़-तोड़ कर पूरा कर लेती हैं, जो शब्द जहाँ  समा जाये बस, उनका मन भक्ति-विभोर है .कोई हँसे हँसता रहे .सारे शब्द राम के ,सारे अर्थ राम के. क्या फ़र्क पड़ता है - भाव तो उनके मन में  है .
भक्ति का सब का अपना-अपना ढंग !
चेतन सुनता रहता है. मतलब भी अपने अनुसार लगा लेता है .अभी बारह बरस का हुआ है . अम्माँ की रजाई को 'राम रजाई' कहता 'है और जाड़ों में कहीं से आते ही ठण्डे हाथ-पाँव  ले कर उसमें घुस जाता है .
कोई टोके,' अरे बाहर से आया वैसे ही हाथ-पाँव उनकी  रजाई में घुस गया .'
' ये तो राम रजाई है सब के भले के लिये ! क्यों अम्माँ, तुम्हीं तो रोज कहती हो ?'
अम्माँ क्या कहें , हँस देती हैं.
अब क्या कर लेगा कोई ?
'कितने ठण्डे हो रहे हैं हाथ-पाँव.'
 अपने हाथों में ले कर गरम करने लगती हैं
'अरे, रहन देओ , मार ठण्डाय गौ है लरिका.  उघार उतार के धुइ जइ है .'
तो अम्माँ की रजाई ,राम-रजाई बना डाली  उसने .
तुलसीदास जी होते तो कैसा लगता उन्हें !
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सोमवार, 8 जुलाई 2013

जागो !तामसी , आज फिर जागो !

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नाथ पंथी  महायोगी गुरु गोरक्षनाथ भ्रमण करते हुए हिमाचल प्रदेश की  कालीधार पहाड़ी स्थित ज्वाला देवी के स्थान पर पहुँच गये.आदिनाथ शिव के  प्रथम शिष्य को आया देख  देवी ने साक्षात् प्रकट हो कर उनका स्वागत किया और  भोजन हेतु आमंत्रण दिया .
गोरख बोले,' देवी ,तुम्हारा भोजन मेरे वश का कहाँ !मैं भिक्षाटन कर सात्विक भाव से जो अन्न मिलता है वही ग्रहण करता हूँ.
' जानती हूँ गोरक्ष .,तुम मेरे अतिथि हो  ,तुम्हारे अनुरूप ही भोजन प्रस्तुत करूँगी.'
'भोजन में भाव का बड़ा महत्व है .तुम मेरी  पूज्या हो, पर मांस -मदिरा होने के कारण  तुम्हारी रसोई में अनायास तामसी गुणों  का प्रभाव आ जाता है? देवि,मुझे क्षमा करो.'
 देवी विस्मित हो उठीं.
'सृष्टि के तीनों गुण सर्वत्र व्याप्त हैं कैसे बचोगे गोरख, थोड़म-थोड़ा तो सब में सब समाया है ? कोई शुद्ध कहीं नहीं मिलेगा तुम्हें !'
'मैंने वैराग्य लिया है , रज और तम से विरत रहने का मेरा व्रत है  . तभी  तो स्वयं-पाकी रह  भिक्षान्न स्वयं राँधता खाता हूँ.'
'तो तमोगुण संसार की बुराइयों का मूल है?'
'तमस् ही मानस की ज्योति को अवरुद्ध करता है.' गोरख नाथ ने उत्तर दिया ,
 'अपरिग्रही रह कर जीवन बिताऊँगा ,पूर्ण सात्विकता और सिद्धि प्राप्ति से  आगे  ब्रह्मलीनता पाना  मेरे जीवन का उद्देश्य है.'
' ...पूर्ण सत्विकता ,' देवी ने दुहराया ,' ..यहाँ सब सापेक्ष है .तुम्हें विरोधी लगते हैं, पर सारे  ही गुण बिंब-प्रतिबिंब भाव से स्थित हैं.परस्पर  पूरक . समयानुसार सब ग्रहणीय.  शाश्वत होना संसार का धर्म नहीं यहाँ काल निरंतर सक्रिय रहता है .सतत परिवर्तनशील और  क्षण-क्षण क्षयमान है यह  जीवन ..  मन पर संयम रख कर संसार को निभाना क्यों नहीं कर पाते ..केवल आत्म-कल्याण ही उद्दिष्ट..! घोर आसक्ति या  एकदम वैराग्य. हर पल  गिरने की संभावना ,तृप्ति न मन की न तन की . . अतियों में जीना हर पल  गिरने की संभावना .'

 'हम और आसक्ति कैसी बात..' गोरख के मुख से निकला

'याद करो ,अपने गुरु मछिंदर नाथ को तुम्हीं तो उस मोह-कूप से निकाल लाये थे .'

गोरख चुप !

तामसी देवी ने कहा, 'गोरख,मैं अगर सौम्य ही बनी रही तो तुम्हारी दुनिया का क्या होगा ?समय के अनुसार गुणों का अनुपात बदलता  है .उन विषम स्थितियों से कौन निपटेगा ?
'ये संसार है. यों ही चलेगा..हम जब सारी माया त्याग, सबसे विरत हो गए ,अब क्यों फँसें दलदल में ?  .'
देवी ने प्रबोधने का यत्न किया -
'संसार में जन्मे हो , उसका निर्वाह  कौन करेगा ? जब पतन काल में बर्बर ,अनाचारी और अनीतियों के पोषक तत्व प्रबल होने लगें .,चतुर्दिक पाशविकता का उन्मत्त का नर्तन  हो, दुर्दान्त वृत्तियाँ अबाध विस्तार पाएँ . दंभी अपने अहंकार में किसी को कुछ नहीं समझें तब उनका दलन आवश्यक नहीं क्या? ये कैसी साधना कि व्यक्ति सबसे विरक्त रह कर आत्मोन्नयन में लीन रहे ! '
'विसंगतियों को दूर करने के लिये ही शुद्ध सात्विक धर्म और भोग-प्रधान योग-साधना के स्थान पर हठयोग साधना का प्रचार कर रहा हूँ .'
 'जीवन  कैसे चलता है गोरख, उसे सँवारने के लिए अपने आपको  खपा देना पड़ता है तब एक पीढ़ी खड़ी हो पाती है. गृहस्थाश्रम, जो  नींव है, उसे ही नकार दिया तुमने .जिस  पर सारा  दारोमदार  टिका है उस से बच कर भाग आए ?'
द्वंद्वों से बच कर ही कल्याण-साधना संभव है - सोचा गोरख ने, पर देवी के सामने बोल नहीं पाए .पहले से सावधान हो जाएँ तो सांसारिकता में फँसने की  नौबत ही क्यों आये !'
  देवी मन ही मन विचारती रहीं -
सब एक जैसे ! एक वे शंभु ,कैलास पर जा बैठे ,विष्णु क्षीरसागर में निद्रालीन .ब्रह्मा  सृष्टि रच कर मसट्ट मार गए. सब अपने में मगन ,तैसा ही यह गोरख   .कोई समझना ही नहीं चाहता .अव्यावहारिक आदर्शवाद से कहीं सृष्टि चली है !ये सब तो आत्म-कल्याण के लिये किनारे हो गये .लोगों के विषय में कौन सोचेगा .संसार का क्या होगा किसी ने नहीं सोचा .'
देवी की मौन मुद्रा देख गोरख बोले
'तुम अदहन चढाओ,मैं  भिक्षा लेकर  अभी  लौटता हूँ .पेट भरने को दो मुट्ठी खिचड़ी बस.'
और  चल दिये अपनी झोली उठा कर .
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साक्षात् अन्नपूर्णा, शंभु-गृहिणि को छोड़ संसार की नारियों से भिक्षा माँगने जा रहे हैं गोरख .
देवी हँस रही हैं .
कह गया है, 'दो मुट्ठी खिचड़ी बस . कोई ममतामयी  गृहिणी दे ही देगी!'
नारी के बिना पेट कौन भरेगा इसका ?माँगेगा अंततः प्रकृति से ही न !
 बड़ा पुरुष बना है, जाने दो !मूढ़ कहीं का.  निवृत्ति मार्ग चलेगा ,परायी गेहिनियों से भिक्षान्न पा कर तृप्त होगा  . माँ-बहिन ,पुत्री किसी की हो -  उसी के रूप हैं सारे .प्रकृति से भिन्न हो कर  पुरुष क्या है -निरा एकाकी,अरूप, बीज सा अव्यक्त-जड़ीभूत,  ,अमूर्त विचार सा निष्क्रिय !
 देवी ने कहा था-
 ' देखो गोरख ,जितने पंथ अकेले पुरुषों को लेकर चले ,अस्वाभाविक होने के कारण अपर्याप्त  रहे .कालान्तर में उनमें विकृतियाँ आईँ ,क्षरण हुआ ,प्राकृतिक जीवन को नकार कर कौन स्वस्थ रह सका ? असंतुलित जीवन  पथ-भ्रष्ट होगा एक दिन!'
 मत्स्येन्द्र की याद कर .तिर्यक् हास मुख पर छा गया .
जाओ गोरख , तम का घेरा जलाने की  सामर्थ्य  कहाँ तुम में ! तभी उससे  भागते हो .सारे संसार में भ्रमण कर जाओ,जहाँ मिले अकेला सत, बटोर लाओ . खोजते रहो  जहाँ  रज-तम का छींटा न पड़ा हो . यहीं बैठी हूँ मैं ..'
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ज्वालाएँ  प्रज्ज्वलित कर अदहन  चढ़ा दिया देवी ने ,
भूखा प्यासा आयेगा तो झट-पट  सीझ जाएगी  खिचड़ी .
मंदिर में बैठी हैं प्रतीक्षा-रत !
विचार चल रहे हैं -
उसे लगता है , मैं तामसी हूँ ,मद्य-मांस का सेवन करती हूँ
 हाँ ,क्योंकि क्रूरता मेरा  स्वभाव नहीं ,कुछ समय का आरोपण भर है  . कहीं  संहार  करते उद्विग्न न हो जाऊँ  . मद पीती हूँ इसलिये कि, दुर्दान्त दानव का हनन करते विचलित न हो जाऊँ . जो असीमित अधिकार चाहता है  मुझ पर ,पशु बना पड़ा रहे तो भी ठीक, पर चेत आते ही बार-बार सिर उठाएगा.  मैं जो प्रकृति हूँ , मुझे  विरूप करना  शासित करना चाहता है .उस पर वार करते ममत्व  न उमड़ पड़े !
 मद पान करती  हूँ कि संहार-बेला में अंतर की करुणा न जाग उठे ,विकृतियों को  ध्वस्त कर डालूँ  .  .मद पीती हूँ कि संहार में संयत-चित्त रहूं सकूँ .
शोणित-बीज उगें, तो पलने दूँ धरती पर ?विकृतियों का नग्न नृत्य होने दूँ ?कौन  पियेगा रक्त?
  तामसी चामुंडा  ही न !
दंड बिना उपाय नहीं , मैं तामसी देवी, तब रक्तपान से भी नहीं हिचकती.
हाँ ,मद पीती हूँ मैं !
गृहिणी हूँ मैं , परम गृहिणी -संपूर्ण नारी !इस पूरी सृष्टि को सँभालना है मुझे. शक्ति के साथ सत और तम दोनों की संयुति आवश्यक है  . अहंकारी  दंड को दंड मिले किन्तु  वह भी सद्गति पाये शान्ति पाये !उन्मत्त भटकेगा तो कैसे सृष्टि में शान्ति का विधान होगा .उसे भी होना है,उसे भी  रहना है ,अपने समय पर  दाँव खेलना है - इतना समर्थ होकर कि सत् को भी चुनौती देता ,उसे जाग्रत रखे ,  संतुलन बनता  रहे .जो वीभत्स है , सौंदर्य की खाद बन जाए.
जब समस्त देव-भाव ,आसुरी अतिचारों से हारता है तो शक्ति की गुह़ार लगती है . मैं अवतरित होती हूँ  .सृष्टि के स्वास्थ्य और शुभ के विधान के लिए . सारी क्षमताएँ योजित करने को  निर्बंध  हूँ .तमोगुण  मेरे लिये बाधा नहीं मेरी  व्याप्ति में उसका भी समावेश  है .
उठती-गिरती लपटें रह-रहकर सोच- मग्न मुख को दमका देती  हैं ,
डिब्बी में अदहन चढ़ा  है!
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 गोरख घूम रहे हैं द्वार-द्वार ,
भिक्षा-पात्र ,में अन्न पड़ता है ,रुकता नहीं . रीता पड़ा है  .
कलयुग बीत रहा है . जब सात्विक अर्जन का श्रद्धामय दान मिलेगा.सज्जन 
मुदित-मन समर्पित करेंगे तब  डिब्बी भरेगी .खौलते अदहन में खिचड़ी बनेगी और देव-गंधर्व मनुज ऋषि-मुनि पंक्ति बद्ध  खड़े होंगे - उस प्रसाद की प्रतीक्षा में!
 युग बीत गये .कब स्वप्न साकार होगा ?
 डिब्बी भरे तब न !
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भिक्षाटन करते हुए हिमालय की तलहटी में आ गये गोरख .  राप्ती व रोहिणी का  संगम .एक पावन स्थान खोज अपना अक्षय भिक्षापात्र रख दिया और साधना में लीन हो गये।
  एक तेजस्वी योगी का  साधना-स्थल . लोग उमड़ उमड़ कर भिक्षापात्र में अन्न-दान करने लगे, भर-भर भाजन  खिचड़ी पड़ रही है . पर पात्र है कि  भरता नहीं .
 सारा दान-मान व्यर्थ ! लालसाएँ पूर्ण होने के लोभ से दी गई भिक्षा,और पराई भूख की गंध समाये अन्न के दाने  ? सुप्त विकार जगा देने वाला दान ,पात्र कैसे भरे ?
कितनी बार आया-गया खिचड़ी का पर्व . पात्र भरा नहीं , योगी समाधि से जगा नहीं  .
चार पस खिचड़ी ? न्याय-नीति की ,सुकृत कर्मों की कमाई ,सद्भाव से अर्पित हो तो भरे कटोरा ? पर   निष्काम भावेन सहज नेह भरे दाल-चावल के दाने नहीं मिले . कैसे  रिक्ति पूरी हो  ?
 दाता का भाव और मुट्ठी का नाज देख कर ही पता लग जाता है कि  कैसी कमाई है  .यह दूषित अन्न कैसे अर्पण करेंगे ,गौ को ,श्वान को ,पक्षियों को और साधु को ?
बिना खिलाये स्वयं किस विध ग्रहण करे साधक  !
ज्वाला देवी  अदहन चढ़ाए बाट देखती बैठी होंगी .
 रिक्त पड़ा पात्र धरे बैठे हैं.
किस मुँह से जाएँ  - भोग कैसे प्रस्तुत  हो ?
उनका कहा बार-बार ध्यान में आता है -
कितनी असंगतियाँ ,अन्याय अतिचार ! मन में जागते सुप्त विकार !'
सुप्त विकार ?
हाँ, यही कहा था उन्होंने..
विकार हैं मुझमें.सुप्त रूप में ही सही ,विद्यमान हैं  ?
  तामसी के स्वर जागे ,'नहीं होते तो काहे भयभीत हो ? गोरख, संसार में आकर अविकारी रह सका कोई ?'
 लगा देवी हँस उठी हैं .
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ओह, अदहन खौल रहा है .
युग बीत गए ,चार मुट्ठी अन्न नहीं पा सके ....कोई आशा भी नहीं .
क्षुधा- तृषा से आर्त,  हताश विश्रान्त गोरख  धऱती पर बैठ गए .
अंतर्मन से अनायास पुकार उठी -
माँ !ओ, माँ !!कहाँ जाऊँ ?
 उन्होंने गोरख से कहा था - निवृत्ति जीवन का मार्ग नहीं  .संघर्षों से पलायन उचित नहीं .
जीवन के प्रकाशित, विहित मार्ग पर क्यों नहीं चलना ?
संसार में आया प्राणी, यहाँ का  आचार -व्यवहार  निभाये,  सो  नहीं  .प्राकृतिक जीवन के अनुकूल रह कर पूर्णता और पक्वता पाये, सो नहीं .विपरीत चलने में शान बढ़ती है  !
लेकिन प्रतिकूल हो कर , प्रकृतिके विरुद्ध जाकर कोई पंथ  नहीं चल पायेगा.अहंकार के वशीभूत हो कर नकारने के परिणाम -  अतृप्ति, कुंठा ,और  केवल भटकन!
 चिन्तन चलने लगा -
कौन हैं देवि ?परम ऊर्जामयी .ओह, कृष्ण-भगिनी हैं भगवती!अखिल विश्व को अपने में धारे सब के मंगल का विधान ही उद्देश्य जिनका ,वही निस्पृह कर्मण्यता .
उन्हीं ने कहा था प्रवृत्ति से  जीवन है .निवृत्ति से नहीं
अपने लिये कहाँ जीते हैं ऐसे लोग !  'न दैन्यं न पलायनं' वही कल्याणकारी संदेश!
तब भी हारे हुए देवता पुकार लगाने पहुँच गए  थे - देवि ,दुष्टों का संहार करो, त्राहिमाम् !
शक्ति, तामसी रूप न धरे तो इस रक्तबीज से निपट सकते हो तुम ,तुम्हारे नारायण या शंकर ?
हाँ  ,मैं तामसी हूँ!
याद आ गया, हारे हुए देव-गण एकत्र हुए थे .अपनी शक्तियाँ समर्पित कर प्रार्थना की थी ,दानवों के संहार की .
 आज फिर हारे हुए देवता शरण पाने को  टेर लगा रहे हैं - रह रह कर पुकार उठ रही है. दिशायें गुँजायमान हो उठी हैं,'
 'उठो माँ ,महाकाली ! तामसी देवी ,कृपा करो !! दानवी  बाधायें  चारों ओर व्याप रही हैं ,जागो महारौद्रै , महाघोर पराक्रमे,
चित्ते कृपा समर निष्ठुरता च दृष्टा त्वयैव देवि,वर दे भुवन त्रयेपि !!!.'

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